Friday, August 19, 2011

केवल यादें रह जाती हैं


मुझे आज भी वह दिन याद है जब मेरी दादी जी को उनकी किसी पुराने मुहल्ले की पड़ोसन का फोन आया था। उस समय मैं शायद प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती थी और घर में फोन कनेक्शन को लगे भी लम्बा अरसा नहीं हुआ था। दादी के चेहरे पर खिली मुस्कान, आवाज़ में भारीपन और आत्मीयता को मैंने देखा, सुना लेकिन उसके मायने या उसका सही अर्थ अब समझ आ रहा है। हमममम..........यह बात इतनी पुरानी है लेकिन मुझे आज भी याद है।
      समय बीता और लाया अपने साथ कई बदलाव। हम बड़े हुए स्कूल से कॉलेज और फिर हुई शादी। इस दौरान कितने लोग पीछे छूटे तो कितने नए लोगों से हुई पहचान। अपना संसार बसाने में व्यस्त, घर और काम में व्यस्त, समय यूँ ही बीतता गया। हम भी समय और दुनिया के साथ-साथ तालमेल बैठाने का प्रयास करने लगे।  
      तकनीकी क्षेत्र की बात करें तो दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और घूम-फिर के यही समझ आया कि दुनिया गोल है। कुछ साल पहले संचार और तकनीक के क्षेत्र में आई क्रांति जिसने सारी दुनिया को बदल दिया। कोई भी इससे अछूता नहीं रहा। किसी समय में पूरे मुहल्ले के एक घर में फोन होता था, अब हर किसी के हाथ में मोबाइल है, किसी को ई-मेल भेजने के लिए साइबर-कैफे ढ़ूँढ़ना पड़ता था तो अब अधिकतर घरों में कम्प्यूटर है। खैर, मैं इसके बारे में अधिक टीका-टिप्पणी नहीं करुँगी।
      हाँ, एक और वरदान प्राप्त हुआ तकनीकी क्रांति से हमें --- फेसबुक। मुझे याद है कुछ साल पहले जब फेसबुक लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा करने के लिए मैदान में उतर चुका था, मेरी एक सहकर्मी ने कहा कि क्यों नहीं तुम इस पर अपना खाता खोलती। मैंने भी स्वयं को अपडेट रखने की खुमारी में फेसबुक पर खाता खोल दिया था। अब अपने लिए मित्रों-सहेलियों को ढ़ूँढ़ू फेसबुक पर ? ? यह बात मुझे कुछ अटपटी-सी लगती थी। क्योंकि मेरे विचार में तो दोस्त-सहेलियाँ खोजने से नहीं मिलते वे तो यूँ ही बन जाते हैं, जिनसे दिल मिलें-विचार मिलें। खैर, सहकर्मी की बदौलत कुछ अन्य सहकर्मियों, सहेलियों के साथ फेसबुक पर भी दोस्ती हुई। लेकिन मेरे फेसबुक का खाता कई महीनों-हफ्तों तक अनछुआ रहता था शायद उसमें बैंक के खाते जितना आकर्षण नहीं था। और एक कारण था कि भई जिन्हें मैं फेस-टू-फेस मिलती हूँ, देखती हूँ तो फेसबुक पर उसका कोई खास आकर्षण नहीं। भूले भटके जब कभी मैं फेसबुक पर जाती तो लोगों के फेसबुक-स्टेटस को देख हैरानी होती जैसे कि एक सहेली ने लिखा --- आजकल मैं केवल पति के चेकबुक और बच्चे की नोटबुक पर ही ध्यान देती हूँ, दोस्तों मेरी मानो तो तुम भी ऐसा ही करो और नीचे थे फोटो थाइलैंड में बिताईं छुट्टियों के। फेसबुक पर उपदेश के साथ-साथ प्रिय सहेली के फोटो देख मैंने तो यही निष्कर्ष निकाला कि जिनके पास अतिरिक्त समय है वे लोग इस पर सक्रिय हैं। वैसे आप में से कुछ लोगों को मैंने अबतक नाराज़ जरुर कर दिया होगा।
      लेकिन समय के साथ-साथ फेसबुक प्रचलित होता गया।   जिसे देखो वो फेसबुक की चर्चा करता। मैं इसके मोह-जाल में अभी तक नहीं फंसी थी। लेकिन एक बार किसी रिश्तेदार की सगाई हुई और हम उसमें शरीक नहीं हो सके तो बताया गया कि फेसबुक पर तुम उनके फोटो देख सकती हो। तो इस वाकये से मेरा फेसबुक के साथ हुआ परिचय दूसरी बार। बाइ गाड, कहीं कोई समारोह, शादी-पार्टी, मुंडन-जन्मदिन, होली-दीवाली फोटो खींचों और डाल दो फेसबुक पर ये देख मुझे अचरज भी हुआ और खुशी भी। अपने बहुत सारे रिश्तेदारों को कई सालों बाद देखने का मौका मिला फोटो में। लेकिन मेरे विचार अब भी बदले नहीं थे। मैं मुश्किल से साल में एक या दो बार ही खाता खोलती थी। ब्याज़ नहीं मिल रहा था शायद..............हाहाहाहाहाहा...........................
      लम्बे अरसे के बाद एक परिचित का मेल आया कि फेसबुक पर उन्होंने आपको निमंत्रण भेजा है। अरे, उनका नाम पढ़कर तो मैं बरसों पहले छोड़े हुए अपने पुराने मुहल्ले में पहुँच गई, अपने बचपन में। दरअसल वे मेरे पुराने पड़ोसी थे और हम एक ही स्कूल में पढ़ते भी थे। फेसबुक पर एक-दूसरे का, परिवार का हालचाल जाना, मिलकर बचपन के खेल, पुरानी यादें ताजा़ कीं, फिर अन्य मुहल्ले वालों के बारे में पूछा। उनसे ज्ञात हुआ कुछ और पुराने मुहल्ले के लोगों के बारे में और यहाँ से मिला लिंक स्कूल का, सहपाठियों का, अध्यापक-अध्यापिकाओं का, कॉलेज का, प्रोफेसर का.......................लिस्ट बहुत लम्बी है। यहाँ तक की वो भी मिल गए जिन्हें केवल अपने बचपन में देखा था और दुनिया की भीड़ में हमसे दूर हुए दशकों बीत गए।
क्या बताऊँ आपसे एक को खोजने चली तो पाया सारा कुम्बा यहाँ बैठा था। बस फिर तो क्या लग गई लत फेसबुक की। यहाँ मुझे मेरे बचपन के मित्र मिले, जो अब मेरी तरह बड़े और मोटे हो गए हैं। ये कहना ज़रूरी है क्योंकि इससे आत्मा को अजीब-सी शांति मिलती है। सब एक-दूसरे के फोटो देख पहला वाक्य यही लिखते हैं- अरे, कितनी बदल गई हो और केवल खाते-पीते घर में गई हो। फेसबुक के जरिए उनके साथ पुरानी यादें ताजा कीं। कौन कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, किस व्यवसाय में हैं....................जैसे कई सवालों की एक साथ बौछार कर देते हैं। बचपन की मीठी-मीठी यादों में, मन बरसों पीछे चला गया। मिलकर पुराने वक्त को याद करना। आज के वक्त की शिकायत करना, सबको अपनी पड़ी है। भाग रहे हैं सब। चारों ओर भागमभाग मची है। कोई भरोसा नहीं करता अब एक दूसरे पर। अधिकतर सहपाठी और मित्र विदेश में बस गए हैं। वहाँ का जीवन कैसा है, कब से हो वहाँ पर इत्यादि-इत्यादि के बाद अब तो सब इंतज़ार कर रहे हैं कि भारत में रियुनियन(सम्मिलन) समारोह आयोजित किया जाए।
      अब पछतावा होने लगा है कि मैं फेसबुक के जादू से इतना समय क्यों दूर रही। प्रतिदिन एक बार यदि फेसबुक पर मित्रों-रिश्तेदारों के संदेश न पढ़ूँ या उन्हें न देख लूँ तो लगता है, दिनचर्या में कुछ अधूरा रह गया है। दूर-दराज बसे अपने रिश्तेदारों के करीब आने का मौका फेसबुक ने दिया।
      बरसों से बिछड़े अपनों से दुबारा मिल मेरा मतलब फेसबुक पर, पुराने, बीते हुए सुनहरे दिनों को एक बार फिर यादों में जीकर जो सुकून मिला, बरसों पहले याद आया दादी के चेहरे पर खिली मुस्कान, आवाज़ में भारीपन और आत्मीयता को जो मैंने देखा, सुना लेकिन उसके मायने या उसका सही अर्थ अब समझ आया। रिश्तों की गर्माहट, लगाव, प्रेम अब समझ आता है। अपनों से दूर होने का दर्द अब महसूस होता है।
      काश मेरी दादी जी हमारे साथ होती तो वे भी अपने पड़ोसियों, सहेलियों को ढ़ूँढ़ने का प्रयास करती और उनके चेहरे पर खिली मुस्कान को काश मैं आज भी देख पाती।

2 comments:

  1. HEY HEMA excellent writing skills keep it up aur yar you still the butiful and not moti at all

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  2. Wow ! Hema...beautifully written...Savita

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