Wednesday, August 10, 2011

चीन में मेरा अनुभव

जब हम अपने देश से बाहर जाकर विदेश में जा कर बसने का निर्णय लेते हैं तो जीवन में उथल-पुथल मच जाती है। यह उथल-पुथल न केवल हमारे अपने बल्कि पूरे परिवार में मच जाती है। जीवन का बहुत अहम फैसला होता है, अपने देश, जन्मभूमि, संस्कृति, परिवारजन, मित्र, काम-काज, घर-गली, मुहल्ला छोड़ कर कहीं और हमेशा के लिए जा बसने का सपना हर कोई संजोता है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए, प्रगति करने के लिए, कुछ पाने के लिए, कुछ खोना पड़ता है। अपने घर- परिवार को कोई अपनी इच्छा से, तो कोई व्यवसाय के कारण, कोई स्थानांतरण के कारण, तो कोई मजबूरी में उन्हें पीछे छोड़ आगे बढ़ जाता है। ऐसे ही आँखों में सुन्दर, सफल भविष्य के सपने लिए हम भी अपने देश से निकलकर, अपने परिवार, रिश्तेदारों, मित्रों को छोड़कर भारी मन परन्तु उज्जवल भविष्य की तलाश में आगे बढ़ आए। हवाईअड्डे पर अपने माता-पिता, भाई-बहन, संगी-साथियों से आँखों में आँसू भरकर, सुबक-सुबक कर, भारी मन से विदा ली और विमान में जा बैठे। खुली आँखों से देखे सपने, दिल में ढे़रों उमंगे लिए, लाखों अरमान सजाकर पर साथ-साथ दिमाग के कोने में घबराहट और डर से भरे हुए विचारों के साथ हम विमान में जा बैठे। कई सवाल उमड़ रहे थे मन में पर जुबान खामोश थी। दिल चाह रहा था कि चल लौट चलें माँ के आँचल में, छुप जाएँ फिर से उनकी ममता की छाँव में, सोच रहे थे क्यों पंख निकल आए हमारे जो अपना नीड़ छोड़, माता-पिता को छोड़ स्वावलंबी बनने निकल पड़े। आज अपने बड़े हो जाने का जितना दुख महसूस कर रहे थे शायद पहले कभी नहीं किया होगा। दिल कह रहा था, कितने स्वार्थी हो तुम माता-पिता की पीर नहीं समझते, यह भी नहीं जानते कैसे रहेंगे वे तुम्हारे बिना। पर यह कहावत शायद हम जैसों के लिए ही बनी है- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। खैर, भारत से विमान में पाँच-छः घंटे का सफर पूरा हुआ और मैं- नव-विवाहिता अपने पतिदेव के साथ पहुँची सिंगापुर की धरती पर। आप मेरा यह वाक्य शायद दुबारा पढ़ रहे हैं। जी हाँ, आपने सही पढ़ा मैं पहुँची सिंगापुर की धरती पर। विवाह के बाद मैं केवल अपने माता-पिता, अपने परिवार से ही दूर नहीं हुई थी बल्कि अपनी जन्मभूमि, अपने देश से भी दूर, विदेश चली गई थी। शायद यही कारण है, कि मैं उस समय बहुत भावुक हो गई थी। आप भी मेरे अब तक के लेख को पढ़कर मेरी उस समय की मनःस्थिति समझ गए होंगे। 

ईश्वर की असीम कृपा रही कि विदेश की धरती ने अपनी बाहें फैलाए हमारा स्वागत किया। न केवल स्वागत किया बल्कि हमें कब अपना बना लिया हमें इसका एहसास दस साल बाद हुआ। जब दस साल बाद एक बार फिर जीवन ने नये मोड़ लेने का फैसला किया और वक्त ने हमें चीन आने का मौका दिया। एक बार फिर से अपनी जड़ से उखड़ कर नई जगह जाकर नए सिरे से जीवन शुरू करना था। वहीं डर और हिचकिचाहट भरे सवालों ने दिल-दिमाग के बीच जंग छेड़ दी थी। खैर, खुद को खुश करने के लिए कह सकते हैं कि हम बहुत बहादुर हैं। दस साल बाद अपना सारा सामान बाँध कर उन मित्रों से, उन रिश्तों से जिन्होंने हमें विदेश में अपनों की कमी का कभी एहसास नहीं होने दिया। उनसे विदा लेकर दो साल पहले हम चीन में पेइचिंग पहुँचे। चीन के बारे में बहुत कुछ सुनते रहते थे, समाचार-पत्रों में, पत्रिकाओं में पढ़ते रहते थे। चीन की तीव्र गति से होने वाली प्रगति को देख आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वर्ष 2008 में आयोजित ओलम्पिक खेलों के बाद चीन विश्व के मानचित्र पर उभर कर आया है और लोगों को अपना सुनहरा भविष्य दिख रहा है। हम भी उज्जवल भविष्य की तलाश में आ पहुँचे चीन की धरती पर।    हवाईअड्डे पर पहुँचते ही जितना चीन के बारे में सुना था उस से कई गुना अधिक ही पाया। हवाईअड्डे से होटल तक पहुँचने में हमें लगभग 35-40 मिनट तक का समय लगा और रास्ते में जहाँ-जहाँ नज़र जा रही थी वहाँ-वहाँ देखकर सुनी और पढ़ी बातों को मानो जैसे प्रमाण-पत्र मिल गया हो। जहाँ देखो वहाँ हरियाली, साफ-सुथरी और चौड़ी सड़कें, सड़कों के किनारों पर लाल-लाल गुलाब खिले हुए थे, गगनचुम्बी इमारतें, सड़कों पर केवल महँगी-महँगी गाड़ियों को देखकर अंदाज़ लगाया जा सकता है कि यहाँ के लोग संपन्न व समृद्ध हैं। यह था पहला-पहला अनुभव और कहते हैं न- फ्रस्ट इमप्रेशन इस द लास्ट इमप्रेशन। तो भई, होटल तक पहुँचते- पहुँचते यह पूरा विश्वास हो गया था कि चीन का नाम अब बहु-चर्चित विकसित देशों में क्यों लिया जाता है। शानदार से होटल में हमारा शानदार स्वागत किया गया। अब मुझे लगने लगा था कि यहाँ जीवन बहुत रोमांचक और मज़ेदार होने वाला है। अब मुझे लगने लगा था कि यहाँ जीवन बहुत रोमांचक और मज़ेदार होने वाला है। जिनसे भी यहाँ के जीवन के बारे में कोई भी सवाल पूछती तो सब एक ही बात कहते कि यहाँ आपको इतना मज़ा आएगा कि आप सिंगापुर को जल्द ही भूल जाएँगी। इतनी बार इस वाक्य को सुनकर मन को सुकून-सा मिलता और अंतर्मन से आवाज़ आती कि सही फैसला लिया है हमने। एक महीने  होटल में समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। दस साल के लंबे अंतराल के बाद मैं नौकरी छोड़कर आराम से जीवन बीता रही थी। कुछ काम करने के लिए नहीं होता था इसलिए मैं या तो सोती रहती या फिर किताबें पढ़ती रहती थी। इस एक महीने में हम ने अपने लिए आवास ढ़ूढा, थोड़ी बहुत पेइचिंग की सैर भी की और यह समझ में आने लगा कि चीनी भाषा सीखना अनिवार्य है।
एक महीने के बाद हम ने अपने लिए बेइंतहा सुन्दर-सा घर किराए पर लिया और नए घर में नए जीवन का श्री गणेश किया। अब तक सब कुछ ठीक-ठाक सही ढंग से चल रहा था। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम किसी नए देश में आकर रहने लगे थे। मैं अपने नए घर को सजाने-संवारने में जुट गई और ऐसी-ऐसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा कि आपको क्या बताऊँ। चलिए, मैं आपको शुरू से सब बताती हूँ। जब मैं कपड़े धोने के लिए वॉशिंग मशीन में कपड़े डालती तो समझ ही नहीं पाती थी कि यह चलेगी कैसे क्योंकि सारे बटनों पर निर्देश तो चीनी भाषा में लिखे होते हैं। कपड़े धुल जाए तो उनको सुखाने के लिए कौन-सा बटन दबाऊँ यह समझ नहीं आता था, कपड़े सूखने के बजाए फिर से धुलना शुरू हो जाते। इतना करके तो मैं थक गई और कमरे में सोफा पर आकर एयर कंडिशन(वातानुकूल) का रिमोट लेकर उसे चलाने लगी तो पाया जीवन काँटों की राह पर चलने का नाम है। जी, यहाँ भी सारे बटनों पर निर्देश तो चीनी भाषा में ही लिखे हुए थे। जब टी.वी देखने का मन किया तो यह भी सरल नहीं था। मैं टी.वी देखने के स्थान पर रिमोट के साथ कई घंटे खेलती रही क्योंकि आवाज़ कम करूँ तो चैनल बदल जाता और जब चैनल बदलना चाहूँ तो आवाज़ बढ़ जाती। मानव स्वभाव होता है बड़ी-बड़ी चीज़ों के साथ आसानी से समझौता किया जा सकता है पर छोटी-छोटी चीज़ों के साथ समझौता करने में उसे परेशानी होती है। मुझे ऐसे लगने लगा मानो आकाश में स्वछंद उड़ते हुए अचानक से किसी ने मेरे पंख काट दिए हो और मैं धम्म से ओंधे मुहँ ज़मीन पर आ गिरी। उन सब लोगों के ऊपर इतना गुस्सा आने लगा, जिन्होंने मुझ से कहा था कि यहाँ बहुत मज़ा आएगा। लगने लगा कि वे शायद कटाक्ष कर रहे थे। जहाँ भी जाऊँ चाहे सब्ज़ी बाज़ार, फल की दुकान,टैक्सी या घर में काम करने वाली आई, कोई मेरी बात नहीं समझ रहा, मैं किसी की बात नहीं समझ पा रही क्योंकि सब चीनी भाषा में बात करते हैं और अंग्रेज़ी न बोल पाते न समझ पाते। इशारों में और थोड़ी अंग्रेज़ी में जैसे-तैसे कठिनाइयों भरा जीवन गुज़रने लगा। सारा दिन घर में बिजली के उपकरणों के साथ खेलना, इशारों में संवाद करना, कुछ दिनों बाद दिल मानो रूआसा होने लगा। मुझे धीरे-धीरे यह लगने लगा कि मैं यहाँ चीन में नहीं रह पाऊँगी। ईश्वर से मन-ही-मन प्रार्थना करने लगी कि मेरी मदद करो। फिर एक दिन किसी परिचित से मुलाकात हुई और वे मेरे चेहरे को देखते ही भाँप गई की अवश्य कोई गंभीर समस्या है। उनके थोड़ा ज़ोर देने पर मैंने अपने दिल की सारी व्यथाएँ उनसे कह डाली। उन्होंने मुझ से केवल एक सवाल पूछा, तुम्हें यहाँ सबसे ज़्यादा क्या खराब लगता है।    मैंने सहसा जवाब दिया कि कोई मेरी भाषा नहीं समझता, मैं चीनी भाषा नहीं समझ सकती। उन्होंने   कहा,  “बस, इतनी-सी बात को तुम अपने दिल पर बोझ लिए जी रही हो।
उनके एक वाक्य ने जैसे मुझे झंझोड़ कर रख दिया और मुझे आत्मग्लानि होने लगी कि मैं इतनी-सी बात को क्यों समझ न पाई। खैर, जब जागो तब सवेरा। मैंने अपना दृष्टिकोण बदला तो मेरा जीवन ही बदल गया। मैं अब आपसे न राजनैतिक, न कला, न संस्कृति, न आर्थिक, न व्यापारिक किसी भी विषय के बारे में नहीं बल्कि अपने निजी अनुभवों के बारे में बताऊँगी जिससे आप यह जान पाएँगे कि कैसे मैं यहाँ से हार मानकर चली जाना चाहती थी और कैसे मुझे इस शहर, इस देश से लगाव हो गया है। मेरी नफरत कैसे प्यार में बदल गई।
यहाँ की सबसे बड़ी खासियत या ताकत है—मददगार लोग। आप कहीं भी, कभी भी, किसी भी स्थिति में अगर किसी कठिनाई का सामना कर रहे होंगे। बस हाथ आगे बढ़ाने की देर है, कोई-न-कोई आकर आप का हाथ थाम लेगा और आपकी मदद करेगा। यहाँ लोगों में दया, करूणा और विन्रमता कूट-कूट कर भरी है। मैं प्रतिदिन ट्रेन में सफर करती हूँ और यदि कोई गर्भवती महिला, वृद्ध, छोटे बच्चे या मुझ जैसे विदेशी को देख कर लोग उठ-उठ कर अपनी सीट बैठने के लिए देते हैं। मैं यदि मना भी करूँ तो अंग्रेज़ी में कहने का प्रयास करते हैं – यू सिट डाऊन। चाहे कितनी भी भीड़ हो, लोग एक-दूसरे से सट कर खड़े हों, तब भी धक्का-मुक्की नहीं होती। सब स्टेशन पर कतार में खड़े होते हैं और आराम से चढ़ते और उतरते हैं। ऐसा बस- ट्रेन दोनों में होता है। राह चलते कभी रास्ता भटक जाएँ, किसी से मदद माँगने पर वे अपनी राह छोड़ हमें सही राह पर पहुँचा देते हैं। किसी चीनी मित्रजन के साथ खरीदारी करने निकलो तो वे मार्गदर्शक बन हमें सब स्थानों से अवगत कराएँगे तथा यह भी बताएँगे कि कहाँ से सामान वाजिब दाम में मिलेगा।  
    दूसरी सबसे बड़ी ताकत इस देश की है—परिश्रमी लोग। मैंने यहाँ किसी को कभी-भी अपने काम से जी-चुराते या काम के लिए आनाकानी करते हुए सुना तक नहीं है। चाहे सुबह के सात बजे से रात के दस बजे तक लगातार काम करने के बाद भी किसी के चेहरे पर शिकन तक नहीं आता और काम में कोई कमी नहीं होती।
तीसरी पर सबसे बड़ी महत्वपूर्ण विशेषता—लैंगिग असमानता का न होना। यहाँ पुरूषों और महिलाओं में केवल अंतर लिंग का है और कोई अंतर नहीं। महिलाएँ भी वे सारे काम करने में सक्षम हैं जिसे पुरूष करते हैं। यहाँ चीन में एक कहावत है- महिलाएँ भी पुरूषों की तरह आधा आसमान उठा सकती हैं।
एक और महत्वपूर्ण विशेषता—यह स्थान हर किसी के लिए सुरक्षित है। घर से बाहर किसी भी समय निकलने के लिए दिल में किसी प्रकार का कोई डर नहीं होता। हम यहाँ देर रात कहीं भी बेझिझक आ-जा सकते हैं। महिलाएँ भी ऐसा कर सकती हैं। हर इमारत में स्वचालित प्रविष्टि के पश्चात ही प्रवेश कर सकते हैं। जहाँ ऐसा होता है वहाँ आप बेहतर और सुकून से जीवन व्यतीत कर सकते हैं। कोई भी व्यक्ति ऐसे ही कहीं भी किसी भी इमारत में आ-जा नहीं सकता। सड़क हो या बाज़ार, गली हो या इमारत, बाग हो या दफ्तर हर जगह अनुशासन, नियम-कानून का ईमानदारी से पालन किया जाता है। सब कुछ सुव्यवस्थित रहता है सदा।
अब अगर मनोविनोद, मनोरंजन की बात करें तो यहाँ पेइचिंग में आप के पास करने को इतना कुछ है, घूमने-देखने के लिए इतनी सारी जगह हैं कि आप थक जाएँगे पर ये खत्म नहीं होंगी। खरीदारों के लिए तो यह जन्नत है। कपड़े, जूते, पर्स, बैग, गहने, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, कम्पयुटर, घड़ियाँ, घर की सजावट की चीज़ें, बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन, चीनी मिट्टी से बनी तरह-तरह की चीज़ें, चंदेल, झाड़ फानूस, गलीचे आदि-आदि की इतनी बहुरुपता मौजूद है कि आप उसका अंदाज़ भी नहीं लगा सकते। तभी तो चीन आज सारी दुनिया को अपने यहाँ निर्मित वस्तुओं का उपभोग करवा रहा है। मैंने पिछले कुछ महीनों में इतनी खरीदारी कर ली है कि घर में सामान रखने की जगह नहीं है, पर इतनी सुन्दर चीज़ें देखकर जी ललचा जाता है।
मुझ जैसे भोजन-प्रेमियों को यहाँ संसार के हर कोने का भोजन खाने को मिलता है। वह भी बिल्कुल घर के जैसा इसलिए कोई कह ही नहीं सकता कि अपने घर या देश की कमी महसूस होती है यहाँ पर। हम जैसे विदेशियों के जीवन को और भी आसान बनाने के लिए यहाँ 4 से 5 अंग्रेज़ी साप्ताहिक, मासिक पत्रिकाएँ छपती हैं। जिनमें हर प्रकार की जानकारी उपलब्ध होती है, जैसे कि कब, कहाँ, कौन-से कार्यक्रम या गतिविधियाँ होने वाली हैं। कब, कहाँ, कौन-से होटल या रेस्तरॉ में प्रमोश्न या कोई विशेष कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी भी उपलब्ध होती है। ये पत्रिकाएँ बिल्कुल मुफ्त मिलती हैं।
हर देश के सामुदायिक समूहों की विस्तृत जानकारी भी उपलब्ध होती है। जिन में भाग लेने पर आप अपने देशवासियों से मिल सकते हैं। ऐसा है चीन। इतना बड़ा देश है यह कि जैसे ही काम से 2 या 3 दिन का अवकाश मिलता है तो हम अलग-अलग शहरों में घूमने जाते हैं और यह पाते हैं कि एक ही देश में कितनी विविधता है। एक-सा होते हुए भी कितना अलग-सा है।
मेरी हमेशा से इच्छा रही थी कि मैं स्वीट्ज़रलैंड जाऊँ और वहाँ बर्फबारी का आनंद लूँ। ईश्वर ने मेरी यह इच्छा यहाँ पूरी कर दी। सर्दियों में यहाँ इतनी बर्फबारी हुई कि धरती को सफेद चादर में लिपटे हुए बस देखते ही बनता था। सिंगापुर में 10 साल केवल गर्मियों का मौसम देखने के बाद आँखें बाग-बाग हो गईं। मोटे-मोटे जैकेट, कोट, लंबे-लंबे जूते पहनने का सपना यहाँ पूरा हुआ।
मौसम के अनुसार मिलने वाले ताज़े फल, सब्ज़ियों का आनंद भारत के बाद यदि मिला तो यहाँ। ताज़ी हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ बाज़ार में देखते ही बनती हैं। गर्मियों में हम ने खूब चैरी,तरबूज़, खरबूज़ा, आम और लिचियाँ खाईं। सर्दियों में खूब लाल-लाल स्ट्राबैरियाँ खाईं और वो भी झाड़ियों से ताज़ी-ताज़ी तोड़ कर।
जी हाँ, मेरा एक और सपना पूरा हुआ इस देश में आकर। मैं हमेशा से चाहती थी कि मैं मीडिया संबंधित काम करूँ पर कभी ऐसा मौका नहीं मिला लेकिन यहाँ मेरा यह सपना भी पूरा हो सका। हिन्दी अध्यापन की सेवा में इतने वर्ष बिताने के बाद यहाँ आकर ऐसा लगा कि अब उसे विरामचिह्न लग जाएगा पर मैं कितनी गलत थी। अपने सहकर्मियों को शुद्ध हिन्दी बोलते देख दिल बाग-बाग हो जाता है। वह भी तब जब मुझे लगने लगा था कि भाषा मेरे जीवन में कितना बड़ा गतिरोधक बन गया था। उन्हें हिन्दी बोलते देख मुझे भी प्रेरणा मिलती है कि मैं भी चीनी भाषा सीख सकती हूँ और मैंने इसका अभ्यास शुरू भी कर दिया है।
कला-संस्कृति संपन्न देश-- इसकी झलक हमें घरों से लेकर, बाज़ारों में, लोगों की वेश-भूषा से लेकर इमारतों में हर पग-पग पर दिखती है। ऐतिहासिक इमारतें जैसे ग्रेट वॉल ऑफ चाइना, फॉरबिडन सिटी, थिएनमन स्कवैर, समर पैलेस, टैंपल ऑफ हैवन और भी बहुत सारी ऐसी इमारतें जिसे देख मैं अमर कथाओं की दुनिया में खो जाती हूँ।
अब दो साल के बाद जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो खुद पर हँसी आती है कि इस सोने की धरती पर जहाँ कदम-कदम पर प्रगति के स्वर्ण अवसर बाँहें फैलाए खड़े है, मैं वहाँ से हारकर चली जाना चाहती थी। इतना कुछ पाया यहाँ केवल दो साल में, असली जीवन कैसे जिया जाता है, यह सीखा यहाँ आकर, घर की याद न सताती अब, बस भाषा में हूँ कच्ची अभी पर जल्द सीख लूँगी उसे भी। फिर कभी मौका मिला तो अपने अनुभव बताऊँगी चीनी भाषा में आपको। यह थी मेरी कहानी, मेरी ज़ुबानी अब तक। एक आम इंसान के आम अनुभव इस महान देश में जिसने हम जैसे कई आम विदेशियों को अपनी बाँहों में लेकर प्यार से गले लगाकर कब अपना बना लिया पता ही नहीं चला। सारे सपने पूरे हुए यहाँ आकर।
आप सोच रहे होंगे कि शायद मैंने चीनी पर्यटन विभाग में काम करना शुरू कर दिया है, लेकिन ऐसा नहीं है। सब नज़रिए का कमाल है, आज कुछ अच्छा लगा तो लिख डाला आपसे बाँटने के लिए कल शायद कुछ और................................................................   

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